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पत्रकार हत्‍याकांड में राम रहीम समेत 4 अन्‍य दोषी करार

चंडीगढ़, 11 जनवरी (आरएनआई):- पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की 2002 में हुई हत्या के मामले में पंचकूला की विशेष सीबीआई कोर्ट ने डेरा सच्‍चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम समेत अन्‍य आरोपियों को दोषी करार दिया है. सजा का ऐलान 17 जनवरी को होगा. गुरमीत राम रहीम हत्‍या का मुख्‍य आरोपी था. फैसला सुनाए जाने के मद्देनजर हरियाणा और पंजाब के कई क्षेत्रों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है. 2003 में इस हत्‍याकांड की जांच सीबीआई को सौंपी गई थी और 2006 में राम रहीम के ड्राइवर खट्टा सिंह के बयानों के बाद डेरा प्रमुख का नाम भी शामिल किया गया था.

आरोप थे कि अक्टूबर 2002 में कुलदीप और निर्मल ने दिनदिहाड़े सिरसा में पत्रकार रामचंद्र को गोली मारी थी. जब 2002 में मामला दर्ज किया गया था तब राम रहीम का नाम एफआईआर में नहीं था. 2003 में जांच सीबीआई को सौंप दी थी और 2006 में राम रहीम के ड्राइवर खट्टा सिंह द्वारा दिए बयानों के बाद डेरा मुखी का नाम भी शामिल किया गया और 2007 में राम रहीम सहित सभी आरोपियों के खिलाफ चलान पेश किया गया था.

24 अक्टूबर 2002 को सिरसा के पत्रकार रामचंद्र छत्रपति को गोलियां मार दी थीं और 21 नवंबर 2002 को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में रामचंद्र छत्रपति की मौत हो गई थी. डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने पहले ही साध्वी यौन शोषण मामले में 20 साल की सजा सुना रखी है.

बेटे के मुताबिक इस मामले में रामचंद्र छत्रपति ने साध्वियों का खत अपने अखबार में छाप दिया था. आरोप है कि जिसके बाद राम रहीम ने छत्रपति को मौत के घाट उतरवा दिया था. रामचंद्र के बेटे अंशुल छत्रपति के अनुसार उनके पिता रामचंद्र छत्रपति ने ही सबसे पहले गुरमीत राम रहीम के खिलाफ तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लिखी पीडि़त साध्वी की चिठी छापी थी. साल 2002 में इस रेप केस की जानकारी पत्रकार रामचंद्र छत्रपति ने पहली बार दी थी. सिरसा मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर दडबी गांव के रहने वाले रामचंद्र छत्रपति सिरसा जिले से रोज शाम को निकलने वाला अखबार छापते थे.

ना सिर्फ छत्रपति ने चिठी छापी बल्कि उस पर कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए पीडि़त साध्वी से इस पत्र को प्रधानमंत्री, सीबीआई और अदालतों को भेजने को कहा था. उन्होंने उस चिठी को 30 मई 2002 के अंक में छापा था, जिसके बाद उनको जान से मारने की धमकियां दी गईं. 24 सितंबर 2002 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले की जांच के आदेश दिए. इस बीच छत्रपति को जान से मारने की धमकियां मिलती रहीं.

24 अक्टूबर को छत्रपति शाम को आफिस से लौटे थे. उस समय उनकी गली में कुछ काम चल रहा था और वह उसी को देखने के लिए घर से बाहर निकले थे. उसी समय दो लोगों ने उन्हें आवाज देकर बुलाया और गोली मार दी. 21 नवंबर को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में उनकी मौत हो गई थी. इसके बाद उनके बेटे अंशुल छत्रपति ने कोर्ट में याचिका दायर कर अपने पिता की मौत की सीबीआई जांच की मांग की थी. जनवरी 2003 में अंशुल ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में सीबीआई जांच करवाने के लिए याचिका दायर की, जिस पर हाईकोर्ट ने नवंबर 2003 में सीबीआई जांच के आदेश दिए थे.

अपने पैतृक गांव दडबी में खेती किसानी करने वाला अंशुल अपनी मां कुलवंत कौर, छोटे भाई अरिदमन और बहन क्रांति और श्रेयसी के साथ अपने पिता को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ रहा है. अंशुल ने जी मीडिया से फोन पर बातचीत के दौरान बताया कि हमने एक ताकतवर दुश्मन के साथ इंसाफ के लिए लड़ाई लड़ी है और उम्मीद है कि 16 साल बाद अब हमें इंसाफ मिल जाएगा. मामले में सीबीआई की ओर से 46 गवाह कोर्ट में पेश किए गए थे. जबकि बचाव पक्ष की ओर 21 गवाही पेश किए गए थे.
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